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Showing posts from May, 2021

क्या है सहज, ज्ञानयोग या भक्तियोग !

 प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं कि - हे अर्जुन आत्मसाक्षात्कार का प्रयत्न करने वाले दो प्रकार के पुरुष होते हैं कुछ इसे ज्ञानयोग के द्वारा तो कुछ भक्तियोग द्वारा समझने का प्रयास करते हैं (3/3) | दार्शनिक शोध भी जीवन के परम लक्ष्य की खोज करती है और भक्ति (कर्मयोग)  भी| इन दोनों विधियों का लक्ष्य एक ही है वह है आत्मसाक्षात्कार अर्थात् स्वयं को जानना | ज्ञानयोग में कहा गया है कि सभी कर्मों को निष्काम भाव से करना उनमें कोई लिप्तता न हो सभी इन्द्रियों को वश में करते हुए कार्य करना.... निश्चित ही बेहद कठिन कार्य है जबकि भक्तियोग में समस्त कर्मों को प्रभु का कार्य जानकर, मानकर प्रभु को समर्पित करना.... निश्चित ही सरल कार्य है | जब ज्ञानी बहुत से वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद तथा महाकाव्य आदि का अध्ययन कर लेता है तो उसमें अपरा (निकृष्ट) शक्ति अहंकार का वास हो जाता है और वह परम लक्ष्य से भटककर सिध्दि, शक्ति के मायाजाल में उलझ जाता है | भक्त अपने समस्त कार्यों को प्रभु को समर्पित करता हुआ आगे बड़ता है क्योंकि प्रभु का भक्त सच्चाई, अच्छाई, प्रसन्नता, धैर्य, विश्वास और प्रेम से पूर्णतय...

पिप्पलाद जी कौन है? जानिये...

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।   एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा- नारद- बालक तुम कौन हो ? बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ । नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ? बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।    तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि  हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष ...

जो भीतर है वही बाहर! (उपवास)

 गतांक से आगे,  उपवास दो शब्दों का युग्म है, जहाँ उप का अर्थ है समीप एंव वास का अर्थ है निवास, रहना आदि | यानि समीप रहना पर किसके समीप रहना?  शरीर नश्वर है, नाशवान है इसे कितने भी जतन करके नहीं बचाया जा सकता है | इन्द्रियों के माध्यम से हम इसका भरण पोषण करते हैं | आत्मा अजर अमर है इसे किसी भी रीति से नष्ट नहीं किया जा सकता है | अतः व्यक्ति उपवास के माध्यम से आत्मा के नजदीक रहने का सार्थक प्रयास करता है जो कि परमात्मा का अंश है | उपवास के प्रकार - 1. शारीरिक उपवास - अन्न जल त्याग करना, योग करना, प्राणायाम करना, खान पान सन्तुलित करना तथा संकल्प द्वारा व्रत करना आदि | 2. मानसिक उपवास - मन पर संयम का अभ्यास करना, ध्यान करना, मन का इन्द्रियों से निग्रह, मन को सात्विक विचारों से भरना | 3. वाचिक उपवास - व्यर्थ में न बोलना, बोलते समय संयम बरतना | अनुचित व व्याकुल करने वाले प्रसंगों पर मौन रखना| जब हम इन तीन प्रकार के उपवासों पर निरंतर कार्य करते हैं तब भीतरी जगत में सुधार होने लगता है और वह बाह्य जगत से समन्वय करने लगता है | वास्तव में शरीर, ब्रह्मांड का ही लघु रूप है | जब यह सूक...

🌹जो भीतर है वही बाहर! 🌹

 गतांक से आगे,  भाग 1 में हमने देखा कि किस प्रकार भीतर और बाह्य में एक रूपता है एंव समन्वय स्थापित करके ऊर्जा के सागर से जुड़ सकते हैं | आज हम चर्चा करेगें कि किस प्रकार बाह्य अवांछनीय जगत को भीतर प्रवेश से कैसे निरूध्द किया जाये| हम स्वयं क्रोध, काम, माेह, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, कपट, षडयंत्र नहीं कर सकते जब तक कोई दूसरा न हो | यह आवश्यक नहीं कि वह (दूसरा) शारीरिक रूप से आपके सामने हो, हम विचारों, भावनाओं से ही युध्द कर सकते हैं | यह सवांद बिल्कुल भौतिकविज्ञान की एक राशि का किसी अन्य राशि के सापेक्ष अध्ययन करने जैसा है | जिस प्रकार किसी वस्तु का भार कम है या ज्यादा है तब तक नहीं बता सकते जब तक कि तुलना (comparison) के लिये अन्य वस्तु न हो | एक सरल से उदाहरण से समझते हैं - मान लीजिए आप एक बाईक पर जा रहे हैं और आपके नजदीक से एक साईकिल वाला और कुछ समय बाद एक कार वाला गुजरता है | ये दोनों आपकी भीतरी जगत को अलग अलग प्रकार से प्रभावित करेगें|  एक की तुलना में आप स्वयं को उच्चतर तथा दूसरी स्थिति में कमतर पाते हैं | ये सब कमाल " तुलना" का ही है आपकी अवस्था दोनों ही स्थिति में नही...

महर्षि दधिचि का संदेश

 🌹महर्षि दधीचि का संदेश🌹 महर्षि दधीचि ने राष्ट्र धर्म के हित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था। उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने-  1. गांडीव 2. सारंग 3. पिनाक जिसमें से गांडीव अर्जुन को मिला था, जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता। सारंग से भगवान राम ने रावण से युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था। और, पिनाक भगवान शिव के पास था जिसे तपस्या के द्वारा रावण ने शिव जी से प्राप्त किया था। परन्तु, वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था। इसी पिनाक की नित्य सेवा श्री सीता जी किया करती थी। पिनाक का भंजन करके ही भगवान श्रीराम ने सीता जी का वरण किया था। ब्रह्मर्षि दधिचि की हड्डियों से ही "एकघ्नी नामक वज्र" भी बना था, जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था। इस 'एकघ्नी वज्र' को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर कर्ण को दे दिया था। इसी एकघ्नी वज्र से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घटोत्कच कर्ण के हाथों मारा गया था। महर्षि दधीचि की हड्डियों से अनेक अन्य अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण भी हुआ था। महर...

जो भीतर है वही बाहर है !

 भाग 2                                                            ज्ञान पिपासा                                                 दिनांक 06 /05 /21                                                             "जो भीतर है वही बाहर है" बाहर की प्रकृति जल, वायु ,अग्नि ,प्रथ्वी तथा आकाश का संयोग है | ठीक उसी प्रकार मनुष्य की काया भी पंच तत्त्वों से निर्मित है जैसे 1. जल - मनुष्य के शरीर में 65  % , 2. वायु - श्वसन का आदान प्रदान , 3. अग्नि - शरीर का ताप जो भोजन को  पचाता है (जठराग्नि ) , 4 . प्रथ्वी -सभी तत्व शरीर में उपस्थित जैसे आयरन ,मैग्नीशियम ,कैल्शियम...

एक पग प्रभु की ओर

          भाग 1                                                     ज्ञान पिपासा                                     दिनांक 25 / 04 / 21               " प्रत्येक क्रिया  के बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है | " गति का तृतीय नियम ,न्यूटन  अर्थात जीवन में इस नियम को इस प्रकार देखते है है की जैसा आप कर्म ( क्रिया ) करते है ठीक उसी के अनुकूल  आपको परिणाम (प्रतिक्रिया ) प्राप्त होते है |                                                         अब प्रश्न उठता है कि हम स्वंय  के लिये क्या चाहते है ? वही कार्य व्यवहार हमें  दूसरों के साथ करना...