जो भीतर है वही बाहर! (उपवास)

 गतांक से आगे, 

उपवास दो शब्दों का युग्म है, जहाँ उप का अर्थ है समीप एंव वास का अर्थ है निवास, रहना आदि | यानि समीप रहना पर किसके समीप रहना? 

शरीर नश्वर है, नाशवान है इसे कितने भी जतन करके नहीं बचाया जा सकता है | इन्द्रियों के माध्यम से हम इसका भरण पोषण करते हैं | आत्मा अजर अमर है इसे किसी भी रीति से नष्ट नहीं किया जा सकता है |

अतः व्यक्ति उपवास के माध्यम से आत्मा के नजदीक रहने का सार्थक प्रयास करता है जो कि परमात्मा का अंश है |

उपवास के प्रकार -

1. शारीरिक उपवास - अन्न जल त्याग करना, योग करना, प्राणायाम करना, खान पान सन्तुलित करना तथा संकल्प द्वारा व्रत करना आदि |

2. मानसिक उपवास - मन पर संयम का अभ्यास करना, ध्यान करना, मन का इन्द्रियों से निग्रह, मन को सात्विक विचारों से भरना |

3. वाचिक उपवास - व्यर्थ में न बोलना, बोलते समय संयम बरतना | अनुचित व व्याकुल करने वाले प्रसंगों पर मौन रखना|

जब हम इन तीन प्रकार के उपवासों पर निरंतर कार्य करते हैं तब भीतरी जगत में सुधार होने लगता है और वह बाह्य जगत से समन्वय करने लगता है | वास्तव में शरीर, ब्रह्मांड का ही लघु रूप है | जब यह सूक्ष्म जगत और स्थूल जगत में एकरूपता हो जाती है तब आश्चर्यजनक और अचरज परिणाम दृष्टिगोचर होने लगते हैं |

यह चमत्कार विज्ञान की उस परिघटना के समान है जिसमें दो लोहे के टुकड़े जिसमें एक को चुम्बक बनाया जाता है तो उसकी शक्ति लगभग 16 गुना बढ़ जाती है |

पता है क्यों - चुम्बक के टुकड़े में सभी अणु चुम्बक एक निश्चित दिशा में संरेखित होते हैं जबकि लोहे के टुकड़े में सभी अणु बंद वक्र बनाते हैं जिससे वह अपनी ऊर्जा का प्रदर्शन नहीं कर पाते|

बस यही घटना जीवन में लागू होती है जब शरीर की ऊर्जा एक ही दिशा में कार्य करती है तब अनुकूल घटनायें होने लगती है |

जय श्री राधे कृष्णा  🙏🙏🙏


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