क्या है सहज, ज्ञानयोग या भक्तियोग !

 प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं कि - हे अर्जुन आत्मसाक्षात्कार का प्रयत्न करने वाले दो प्रकार के पुरुष होते हैं कुछ इसे ज्ञानयोग के द्वारा तो कुछ भक्तियोग द्वारा समझने का प्रयास करते हैं (3/3) |

दार्शनिक शोध भी जीवन के परम लक्ष्य की खोज करती है और भक्ति (कर्मयोग)  भी| इन दोनों विधियों का लक्ष्य एक ही है वह है आत्मसाक्षात्कार अर्थात् स्वयं को जानना |

ज्ञानयोग में कहा गया है कि सभी कर्मों को निष्काम भाव से करना उनमें कोई लिप्तता न हो सभी इन्द्रियों को वश में करते हुए कार्य करना.... निश्चित ही बेहद कठिन कार्य है जबकि भक्तियोग में समस्त कर्मों को प्रभु का कार्य जानकर, मानकर प्रभु को समर्पित करना.... निश्चित ही सरल कार्य है |

जब ज्ञानी बहुत से वेद, पुराण, शास्त्र, उपनिषद तथा महाकाव्य आदि का अध्ययन कर लेता है तो उसमें अपरा (निकृष्ट) शक्ति अहंकार का वास हो जाता है और वह परम लक्ष्य से भटककर सिध्दि, शक्ति के मायाजाल में उलझ जाता है |

भक्त अपने समस्त कार्यों को प्रभु को समर्पित करता हुआ आगे बड़ता है क्योंकि प्रभु का भक्त सच्चाई, अच्छाई, प्रसन्नता, धैर्य, विश्वास और प्रेम से पूर्णतया उचित कार्य ही प्रभु को समर्पित करेगा| फलस्वरुप वह एक दिन अनौतिक और अवगुणों की जजींरों को काट देता है | वह आठ प्रकार की अपरा शक्ति की सीमाओं से परे निकल जाता है | ये आठ अपरा प्रकृति - प्रथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुध्दि तथा अहंकार |

जब तक ज्ञानी को अपनी गलती  का अहसास होता है तब तक बहुत देर हो जाती है (उध्दव और गोपी प्रसंग) |

अर्थात जो कार्य भक्त प्रारम्भ में करता है वही कार्य ज्ञानी सभी तरह के कड़वे - खट्टे अनुभव के बाद करता है |

आशय, प्रभु की शरण में ही सार है..... गीताशास्त्र, जीव को कृष्ण की अनेक शक्तियों में से एक मानती है अतः जीव (एक शक्ति) का धाम परमात्मा (शक्ति पुंज) ही है |

जय श्री राधे कृष्णा  🙏🙏🙏

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