जो भीतर है वही बाहर है !

 भाग 2                                                           ज्ञान पिपासा                                                 दिनांक 06 /05 /21 

                                                           "जो भीतर है वही बाहर है"

बाहर की प्रकृति जल, वायु ,अग्नि ,प्रथ्वी तथा आकाश का संयोग है | ठीक उसी प्रकार मनुष्य की काया भी पंच तत्त्वों से निर्मित है जैसे 1. जल - मनुष्य के शरीर में 65  % , 2. वायु - श्वसन का आदान प्रदान , 3. अग्नि - शरीर का ताप जो भोजन को  पचाता है (जठराग्नि ) , 4 . प्रथ्वी -सभी तत्व शरीर में उपस्थित जैसे आयरन ,मैग्नीशियम ,कैल्शियम ,जिंक आदि , 5. आकाश - शरीर को आधार या संतुलन प्रदान करता है जिस प्रकार ग्रह ,तारे ,गैलक्सियाँ आदि  को |

                             जब हम भीतर की संरचना को योग, प्राणायाम तथा ध्यान से संतुलित एवं समन्वित कर लेते है | तब हमारी बाहर की प्रकृति से तालमेल उचित होने लगता है | बाह्य प्राकृति की तुलना में शरीर की आंतरिक प्रक्रति अंश मात्र है | जब हम बाह्य प्रकृति से तालमेल बिठा लेते है तो हम असीम ऊर्जा के सागर से संबधित हो जाते है | 

                             भौतिक विज्ञान का नियम बताता है की प्रवाह उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर होता है | यह हम सामान्य जीवन में भी देखते है | ठीक इसी प्रकार हमें भी ऊर्जा के असीम स्त्रोत से ऊर्जा और शक्ति मिलने लगती है , एवं घटनाएँ हमारे अनुकूल घटित होने लगती है |

                                                               जय श्री राधे कृष्णा 😊👐

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