इच्छा पात्र

🌹💐इच्छा पात्र💐🌹
एक संन्यासी महात्मा राजा के दरबार में पहुंचते हैं और कुछ दान देने की याचना करते हैं ।राजा उनसे पूछते हैं हे महात्मा आप क्या चाहते हैं यह सुनने पर महात्मा कहते हैं कि जो भी आपकी  इच्छा हो वह आप इस  पात्र में दे दें कुछ  जो आप देना चाहते हैं। कुछ भी शब्द सुनकर राजा को थोड़ा अजीब लगा और बुरा भी लगा, राजा ने सोचा कि मैं इतने धन-धान्य से संपन्न राज्य का राजा हूं मुनिवार चाहते तो कुछ भी मांग सकते थे मैं इनकी इच्छा अवश्य पूर्ण कर सकता हूं पर कोई बात नहीं मैं इनके पात्र को स्वर्ण मुद्राओं से भर देता हूं यह कहकर राजा ने अपने मंत्री को यह आदेश दिया की सन्यासी महाराज के पात्र को स्वर्ण मुद्राओं से भर दिया जाए राजा का आदेश पाकर महामंत्री जी ने ऐसा ही किया स्वर्ण मुद्राओं को पात्र में डाला डाला तो देखते हैं की जो स्वर्ण मुद्राएं पात्र में डाली वह गायब हो गई पात्र पुन: खाली की खाली ही रह गया। यह देखकर मंत्री अचरज में पड़ गए और धीरे-धीरे सारा स्वर्ण भंडार रिक्त होने लगा परंतु पात्र अभी भी रिक्त था जब यह बात महाराज को मालूम हुई तो वह सन्यासी जी के सामने आए और उन्होंने याचना की महात्मा आप कोई साधारण महात्मा नहीं है और ना ही आपका यह पात्र साधारण है कृपया करके मुझे यह बताइए कि यह पात्र भरता क्यों नहीं है ।
तब महात्मा बोले कि है महाराज यह पात्र मन का पात्र है मन का पात्र कभी भी नहीं भरता चाहे इसे कितना भी सौंदर्य, बुद्धि धन ,शोहरत ,दौलत आदि जितना मिल जाए यह सदैव और और की चाहत ही करता रहता है ।
मन का पात्र के भरने का केवल एक ही उपाय है वह ईश्वर का मनन एवं चिंतन करना यह बात सुनकर महाराज जी समझ गए कि मन को वश में करने का केवल और केवल एक ही उपाय है ईश्वर का ध्यान मनन चिंतन भजन आदि.
 जय श्री राधे कृष्णा💐💐💐

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