जो भीतर है वही बाहर !( संगीत साधना)

" संगीत साधना "संयुक्त रूप से इस शब्द का अर्थ है संगीत की साधना, आराधना ,ध्यान ,संगीत में उतरना ,संगीत को गहराई से समझना आदि आदि ।

जब "संगीत साधना "को अलग अलग करते हैं तो एक चमत्कारी घटना होती है ,जीवन को जानने का नजरिया बदलता है ,जीवन में आनंद प्रस्फुटित होता है ।*संगीत और साधना *अब इन शब्दों के मायने परिवर्तित हो जाते हैं ।

मन में कौतुहल भरे प्रश्नों का संचार होता है ,संगीत से साधना कैसे? संगीत के माध्यम से परमानंद कैसे ?संगीत से प्रभु भक्ति कैसे? ऐसे कई प्रश्न मन को उद्वेलित  करते हैं ।

 शरीर संसार का लघु प्रतिरूप है जो बाहर है वही भीतर भी। मानव शक्तियों क्षमताओं से भरा पिंड है क्यों ?इसका जवाब मानव उस परम सत्य  परमात्मा का अंश आत्मा है। शरीर केवल रथ है जो प्रकृति के सहयोग से निर्मित है ।अतः यह शरीर प्रकृति में ही विलीन हो जाता है जबकि आत्मा परमात्मा का अंश जो कभी नष्ट नहीं होती और किए गए कर्मों के आधार पर अन्य उच्च या अधम योनियों में प्रवेश करती है ।

वास्तव में मनुष्य अभी पूर्णत:चेतना में नहीं है वह अभी आधा जागा और आधा सोया हुआ है यही कारण है कि जो अमीर है वह भी दुखी है और जो गरीब है वह भी दुखी है । प्रत्येक इंसान चेतना के अभाव में दुखों का भोग कर रहा है ।

अर्द्ध चेतना के कारण उसका सुख भौतिक संसार में ठहर गया चमड़ी और दमड़ी में अर्थात भोग (शरीर )की लालसा और दमड़ी यानी धन की कभी न पूर्ण होने वाली इच्छा ।

जब तक हम पूर्ण चेतना में प्रवेशनहीं करते तब तक यही हमारे सुख के आधार होंगे जो कि नितांत क्षणिक है।

 अब बात आती है पूर्ण चेतना कैसे? जिस प्रकार बांसुरी मैं संगीत छुपा हुआ है उसे निकालने के लिए सही मात्रा में हवा और समय की आवश्यकता होती है ,ठीक उसी प्रकार शरीर की शक्ति के स्त्रोतों को जागृत करने के लिए विभिन्न नाड़ियों और चक्रों को कंपन की आवश्यकता होती है ।जैसे कुंडलियां और हमारे शरीर में विभिन्न चक्र यथा मूलाधार, स्वाधिष्ठान ,मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध ,आज्ञा और सहस्त्रार चक्र । संगीत साधना के द्वारा इन चक्रों में छुपी हुई अनंत ऊर्जा का लाभ लिया जा सकता है । इसी प्रकार संपूर्ण शरीर में नाड़ियों की संख्या लगभग 3:50 लाख होती है परंतु इनमें प्रधानता मात्र 14 की होती है ,शिव संहिता के अनुसार इंगला ,पिंगला , सुषुम्ना,गांधारी, हस्थजीव्हा, कुहू, सरस्वती, पूणा , शंखनी,पयपसिनी, वरूणी, अलंबुषा, विश्वेदरी और यशस्विनी। इनमें तीन प्रमुख होती है - इंगला, पिंगला और सुषुम्ना। इनमें भी सुषुम्ना प्रमुख होती है,इन 350000 नाड़ियों की सूचना भार के रूप में, सुषुम्ना नाड़ी कुंडलिनी को आवरण किए रहती है। संगीत के सात सुर "सा ,रे ,गा ,मा ,पा ,धा ,नि "इन सात चक्रों को सुसुप्त अवस्था से जागृत अवस्था में लाने की असीम शक्ति रखते हैं ।हम देखते है कि संगीत के मूर्धन्य विद्वान पंडित किस प्रकार से शांत , धैर्य और ओज से परिपूर्ण रहते हैं ।संगीत की देवी मां सरस्वती और नटराजन की शक्ति से ओतप्रोत होते हैं। संगीत की किसी भी विद्या गायन, वादन और नृत्य के द्वारा शरीर में छुपी हुई अनंत ऊर्जा को बाहर निकाला जा सकता है। यह तभी संभव होगा जब हम किसी भी विद्या को चरम पर ले जाएं । अर्थात हमारा यह शरीर स्वयं ही गायन, नृत्य और वादक बन जाए । हमारे रोम रोम से संगीत का नाद सुनाई देने लगे।

 वैज्ञानिक तर्क है कि _ हर वस्तु की चाहे वह सजीव हो या निर्जीव हो ,सभी की एक निश्चित आवृत्ति होती है जरूरत है तो सिर्फ इस बात की ,कि उस वस्तु के बराबर की नाद (ध्वनि) उत्पन्न की जाए । जब यह बराबर की आवृत्ति उत्पन्न होती है तो वह वस्तु जैसे कुंडीलिनी,चक्र आदि कंपन करने लगते हैं और अनंत ऊर्जा का विस्तार होता है । जब यह ऊर्जा उच्चतम स्तर पर पहुंचती हैं हम पूर्ण जागृत अवस्था में होते है तब स्वं से ही अनंत आनंद की लहरें उठने लगती है। बाह्य भौतिक जगत की खुशियां गौड़ हो जाती है।

इस प्रकार हम सभी के चक्रों को जागृत अवस्था में लाकर साधना की ओर और साधना से समाधि की ओर ले जा सकते हैं जय जय श्री राधे कृष्ण🙌🙌🙌


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