पापमोचिनी एकादशी
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है|
राजा मन्धाता ने धर्म के ज्ञाता और गूढ़ रहस्यों को बताने वाले महर्षि लोमस से पूछा, कि हे ऋषिश्रेष्ठ मनुष्य के पापों को कैसे नष्ट किया जा सकता है कोई सहज एवं सरल उपाय बताइए |
इस पर ऋषि श्रेष्ठ ने कहा हे राजन मैं आपको पापमोचनी एकादशी के व्रत की कथा सुनाता हूं इसे सुनकर मनुष्यों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं |ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिए|
प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक वन हुआ करता था जिसमें अनेक अप्सराएं किन्नरों के साथ विहार करती थी वहां सदैव बसंत का रमणीय मनोहारी मौसम रहता था ,नाना प्रकार के पुष्प तथा वनस्पतियों से यह जंगल आच्छादित रहता था उस वन में देवी -देवता ,गंधर्व ,किन्नर ,अप्सराएं आदि का आवागमन सदैव बना रहता था |
उसी उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि तपस्या में लीन रहते थे ,वह शिव जी के अटूट भक्त थे | एक दिन मंञ्जुघोषा नाम की एक अप्सरा ने उनकी निकटता का लाभ लेने की चेष्टा से उनके निकट कुछ दूरी पर बैठकर वीणा द्वारा मधुर स्वर निकालने लगी| उसी क्षण कामदेव भी महर्षि को जीतने का प्रयास करने लगे | कामदेव ने एक सुंदर अप्सरा के भ्रू को धनुष बनाया, कटाक्ष की प्रत्यंचा बनाई और उसके नेत्रों को मंञ्जूघोषा आप्सरा का सेनापति बनाया |
उस समय महर्षि युवावस्था में थे उन्होंने यज्ञोपवित तथा दंड धारण कर रखा था | मुनि को देखकर कामदेव के बस में हुई मंञ्जूघोषा ने मधुर स्वर में गायन प्रारंभ किया तो , भक्त मेधावी भी अप्सरा पर मोहित हो गए| इसका लाभ उठाकर अप्सरा, मुनि को आलिंगन करने लगी मेधावी शिव रहस्य को भूलकर काम के वशीभूत होकर अप्सरा के साथ रमण करने लगे | काफी समय के बाद जब अप्सरा ने कहा हे ऋषिवर मुझे बहुत समय हो गया है अब स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए | ऋषिवर ने अनुनय विनय से अप्सरा को रोक लिया |
कुछ समय बाद अप्सरा ने पुन: आज्ञा मांगी , ऋषिवर ने पुन: रूकने का आग्रह किया तब अप्सरा ने कहा ऋषिवर आपकी रात बहुत लंबी है | क्या अब और ज्यादा समय रूकना उचित है | अप्सरा की बात सुनकर मुनि को समय का बोध हुआ, 57 वर्ष का समय बीत चुका था साथ रहते | तब ऋषि को बड़ा ही क्रोध और गिलानी भी हुई उनके तप का नाश जो हो गया था |क्रोध से थरथराते स्वर में मुनि ने अप्सरा से कहा तुमने मेरा तप को नष्ट किया है |तुझ पर धिक्कार है, अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा |
अप्सरा ने ऋषि से आग्रह किया ऋषिवर मुझ पर प्रसन्न होइए और इस श्राप से मुक्ति का उपाय बताइए, विद्वानों ने कहा है कि साधु संतों की संगत अच्छा फल देने वाली होती है और मैंने तो आपके साथ कई वर्ष व्यतीत किए हैं कृपया करके मुझ पर प्रसन्न होईये |
ऋषि बोले तूने मेरा बड़ा बुरा किया है किंतु फिर भी तुझे इस श्राप से मुक्ति का उपाय बताता हूं चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसका नाम पापमोचनी है उस एकादशी का व्रत करने से तुझे पिशाचिनी देह से मुक्ति हो जाएगी |
इसके पश्चात मुनि ,अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए| पिता पिता ने पुत्र को देख कर कहा कि तुमने ऐसा क्या किया है कि सारा तप नष्ट हो गया है तेज तुम्हारा मलिन हो गया है |
मेधावी का सिर लज्जा से झुक गया और पिता को सारी बात बता कर उपाय की याचना करने लगे तब पिता ने चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का विधि तथा भक्ति पूर्वक उपवास करो तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएंगे ऐसा कहा |तत्पश्चात मुनि मेधावी ने पिता की आज्ञा के अनुसार व्रत रखकर अपने पापों से मुक्ति प्राप्त की |अप्सरा भी उपवास रखने के कारण मुक्त होकर स्वर्ग चली गई |
अत: हे राजन इस एकादशी के प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं| इस एकादशी की कथा के श्रवण तथा पठन से 1000 गौ दान करने का फल प्राप्त होता है ,स्वर्ण चुराने वाले ,ब्रह्मा हत्या करने वाले ,अागम्या गमन करने वाले भयंकर पापों से मुक्ति मिल जाती है |और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है |
जय जय श्री राधे कृष्णा
Radhe radhe
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