कामदा एकादशी की व्रत कथा
कामदा एकादशी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को मनाई जाती है भक्तजनों इस व्रत की मान्यता इस प्रकार है कि व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है । इस व्रत के करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है अर्थात यह मनुष्य की कामना पूरी करने वाला व्रत है ।
व्रत की कथा इस प्रकार है _
महाराज युधिष्ठिर की याचना करने पर प्रभु श्री कृष्ण ने कामदा एकादशी व्रत का महत्व बताया । प्राचीन काल में एक नगर था जिसका नाम भोगीपुर था । यहां पुंडरीक नाम का राजा राज्य करता था। इस नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर एवं गंधर्व सुख पूर्वक निवास करते थे । यहां एक पति पत्नी का जोड़ा ललिता एवं ललित निवास करता था । उनके मध्य अगाध प्रेम था वह एक दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह पाते थे।
एक दिन ललित अन्य गंधर्व सहित पुंडरीक की सभा में गायन कर रहा था, उसी क्षण उसे अपनी पत्नी की याद आ गई जिससे उसका स्वर बिगड़ गया । तब कारकोट नामक नाग ने ललित के मन का भाव जानकर, नाग ने गायन के पद के भंग होने की बात राजा को बताई। जिससे राजा क्रोधित हो गया और श्राप किया जा तू राक्षस बन जा ।
इस प्रकार श्राप के कारण वह राक्षस योनि में अनेक प्रकार का कष्ट भोगने लगा। जब यह बात उसकी पत्नी ललिता को ज्ञात हुई तो उसे बड़ा खेद हुआ। वह अपने पति के उद्धार का उपाय सोचने लगी ।
एक बार ललिता अपने राक्षस पति ललित का पीछा करती हुई विंध्यांचल पर्वत पर पहुंच गई जहां पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था ।ललिता श्रृंगी ऋषि के पास जाकर अनुनय विनय करने लगी तब ऋषि बोले तुम कौन हो और यहां किस लिए आई हो ,इस पर ललिता ने ऋषि को सारी बात बताई और ऋषि से इस श्राप की मुक्ति के लिए उपाय का निवेदन किया ।
तब ऋषि ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी का व्रत विधि विधान से करने की सलाह दी ।
ललिता ने ऋषि के वचनों का पूर्णरूपेण पालन किया और अपने पति को प्रेत योनि से मुक्त कराया और वह पहले जैसा गंधर्व बन गया ।
जय श्री राधे कृष्णा🙌🙌🙌
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